प्रेमचंद की यथार्थ कहानियाँ- कल, आज और कल

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munshi-premchand-720x960मेरा 9 साल का बेटा शायद उन्हें ना जानता हो लेकिन हाँ उनकी लिखी वो कहानी “ईदगाह” उसे ज़रूर याद है. हामिद और उसका वो चमत्कारी चिमटा, जो वह कभी नहीं भूल सकता. आज भी किचन में जब चिमटा देखता है तो एक बार ज़रूर पूछता है- मम्मी! ये वही चिमटा है ना, हामिद वाला, जो उसने अपनी दादी के लिए खरीदा था? सच कहती हूँ, मन गदगद हो उठता है जब अपनी संतान का किसी ऐसे भावपूर्ण कहानी की ओर इतना गहरा झुकाव देखती हूँ. खुद मुझे याद है मेरा बचपन, जब मेरे पिता स्कूल में “निर्मला” उपन्यास पढ़ाया करते थे. मेरे कई मित्रों को भी याद होगा. वो भालचंद्र ओझा के काले रंग (वर्ण) का वर्णन, वो निर्मला का दर्द, उसकी बेबसी और ख़ामोशी, और मेरे पिता का भाव- विभोर होकर उस कहानी में डूब जाना, मुझे सब याद है. ऐसा लगता था जैसे पूरी कहानी हमारे सामने साक्षात चल रही हो. और फिर ऐसी ही कई कहानियाँ आती गयीं- “बूढी काकी”, “पंच- परमेश्वर” “कफ़न”, “बेटी का धन”, “गोदान” या “शतरंज के खिलाड़ी”, ये सारी कहानियाँ आज भी उतनी ही ताज़ा और सजीव हैं जितनी आज से 80-90 बरस पहले हुआ करती थीं. इन्हें कितनी बार ही क्यों ना पढ़ लें, हमेशा कुछ नया, फिर भी अपना- सा ज़रूर लगता है.

जी हाँ, ऐसा जादू था मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियों में. आज ही के दिन, यानि कि 31 जुलाई 1880 को यथार्थवादी परंपरा की नींव रखने वाले इस संवेदनशील लेखक का जन्म हुआ था.  उनकी लिखी कहानियाँ हर उम्र, हर क्षेत्र, हर गाँव और हर ऐसे मानुष के लिए बनी थीं जिनका वर्णन आज के समय में भी किया जा सकता है. प्रेमचंद अपनी कहानियों के माध्यम से हमें हर उस गाँव, खेत, कचहरी, तालाब और पंचायत के पास ले गए जहाँ जाने की तमन्ना आज का  शहरी युवा एक न एक बार ज़रूर करता है और इन्हीं कहानियों के जरिये वहाँ की कल्पना भी कर लेता है.  इसलिए ये कहना बिलकुल सटीक होगा कि मुंशी प्रेमचंद जी ने किसी ख़ास वर्ग, समय या परिस्थिति के दवाब में आकर नहीं बल्कि एक ऐसे यथार्थ का वर्णन किया जिसे समाज चिरकाल तक देखेगी और महसूस भी कर सकेगी.

अब बूढी काकी को ही ले लीजिये. यह कहानी इतनी सरल और सहज है कि हर परिवार इसे अपने घर के किसी न किसी वृद्ध सदस्य से जोड़ ही लेगा. “बुढापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है”- यह बात आज भी उतनी ही तथ्यपूर्ण है जितनी कि पहले थी. मेरे ससुराल में भी एक बूढी काकी थीं, हम उन्हें मैयां कहकर बुलाते थे. दिखने और चाल- ढाल में बिलकुल वैसी ही थीं और बूढी काकी की ही तरह चटोरी भी. उम्र 80 से भी ऊपर होगी उनकी, मेरे दादा ससुर की मामी जो थीं. और घर के बड़े से लेकर बच्चे तक सबका उन्हें डांटना और टोकना एक आम बात थी. मेरी सास भी रूपा से कम ना थीं जो अक्सर उन्हें डांटकर झटक दिया करती थीं और हर बात पर टोका भी करती थीं. लेकिन हाँ, अगर उनकी तबीयत बिगड़ जाती या वह कुछ ना खाती तो मेरी सास रूपा की ही तरह चिंतित भी हो उठती थीं. और यह सारा दृश्य देखने वाली मैं, प्रेमचंद के उस बूढी काकी को अपनी आँखों के सामने ले ही आया करती थी.

तो कहने का अर्थ यह हुआ की मुंशी प्रेमचंद ने जिस अंदाज से ग्रामीण बोली और ठेठपन को अपनी कहानियों में उतारा और जिस तरह ग्रामीण जीवन की सादगी और सूक्ष्म दृश्यों का वर्णन किया है वह आज भी लोगों को उतनी ही पसंद आती हैं और उतनी ही सहजता से स्वीकारी भी जाती है. दारु पीकर मस्त पड़े एक ऐसे निकम्मे पति को देखकर अक्सर “कफ़न” के माधव की ही याद आ जाती है जिसने अपनी गर्भवती पत्नी के मृत शरीर को ढकने के लिए मिले कफ़न के पैसे तक को शराब में उड़ा दिया था. हर कहानी में मानवीय रिश्ते और भावों को इतनी गहराई और भावुकता से प्रस्तुत करने का हुनर सिर्फ और सिर्फ प्रेमचंद में ही हो सकता था.2013_07_31_12_08_35_premchand600D

प्रेमचंद की इन्हीं सादगी और सूक्ष्म वर्णन की शैली ने हम पाठकों को आज भी यथार्थ को समझने और स्वीकार करने की समझ दी है.  आज की युवा भले ही कई नए लेखकों को पढ़ और समझ ले किन्तु आज भी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय ग्रामीण जीवन को समझने का एक बड़ा ही संवेदनशील माध्यम है.

मुंशी प्रेमचंद जी को उनके 136वें जन्मदिन पर कोटि कोटि नमन एवं उनके अतुलनीय रचनाओं  के लिए सम्मान एवं श्रद्धांजलि.

-अनुकृति झा

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मैं पत्रकार हूँ

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Source- NDTV
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मैं पत्रकार हूँ
हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

ख़बरों की खबर लिए
निर्भीक और निडर बने
मैं तेरा स्तम्भकार हूँ।
हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

कलम है मेरे हाथ में
है सत्य मेरी बात में
ना मोल से, ना लोभ से
ना ताकतों के रौब से
झुका नहीं, टिका रहा
मैं ऐसा वज्रहार हूँ।

हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

तू चाहे मुझको तोड़ दे
चाहे तू मेरी जान ले
जलना पड़े अंगार में
या गोली की बौछार में
मैं सच की राह पर चलूँ
ना डरूँ, ना विश्राम लूँ
जो शब्द- शस्त्र से लड़ूँ
मैं ऐसा व्यंग्यकार हूँ।

हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

मैं जा रहा हूँ, मेरे पीछे
देश सारा रो रहा
ये मत समझना, ये मेरा
विद्रोह शांत हो रहा
ये कलम उठती रहे,
क्रांति का अंगार ले,
हर झूठ के विरोध में
सतत खड़ा तैयार हूँ।

मैं पत्रकार हूँ।
हाँ, मैं पत्रकार हूँ। ©

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सत्य

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रौबदार, सीधा- सपाट
पूर्ववत
काला- स्याह
किन्तु स्पष्ट

कभी कड़वा- कसैला
दिल दुखाता,
हर्षाता, कभी उल्लास
शक्तिदाता

कभी सूखे दरख़्त- सा
नंगा- निर्वस्त्र
कभी मरियल, किन्तु अटल
निर्भय, निडर

कभी ऐसा भी होता
ना रहकर भी रहता
कभी रहकर भी विलुप्त
कभी चुप, कभी गुप्त।

कभी पीछे धकेलता
कभी आगे ले चलता
डूबते तैरते,
कभी पार ले जाता।

कभी छाँव, कभी धूप
सत्य के हैं कई रूप।

खोलो परतें
करो आलिंगन
सत्य तुम भी, हम भी
और यह जीवन। ©

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We All Are Homosexuals. Want to know your traits of Same Sex Love?

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Homosexuality- YellowHorizonSome call it a disease, some call it a psychological disorder and for some, it is insanity having unnatural sexual choice. And for those who favor it, call the opposing people orthodox and conservative and prize HOMOSEXUALITY as a freedom of expressing their desire, lust and their physical need to the same-gender. The homosexuality is a new trend today. Why trend, because even if it would be existing earlier, people were not comfortable to openly talk about it or accept this fact in front of others. An AIIMS doctor’s suicide is a very fresh example to bake the context of “fear of society”, where a man or woman is forcibly dumped into the marriage upon hearing his or her homosexual instincts or even sometimes the person is unable to express his or her sexual desire to their parents or friends and are forced to live with the opposite sex, choking their life. The fear, despair and suicidal attempts upon the frustrating homosexual tendencies led to the formation of LGBT Community talking about the gay, lesbian and bisexual traits, asking for their liberal sexual rights and the freedom of choosing the partner of any sex. (more…)

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Daily Rapes and Sexual Molestations- An Unbeatable Fear Bulging in my Body Every Day

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I with my younger brother was walking across the service lane of District Centre Janakpuri to reach the Parking area, while we were discussing about the growing rape incidences in the capital and the fearless behavior of such callous people around. He was telling how one of his friends’ friend escaped from an attack on the main road of Laxmi Nagar amidst the passersby when an Omni tried to grab her suddenly, she just pushed the man and jerked herself towards the divider. The famous capital is today a place where you never know when you are the victim of this heinous crime while you are talking about it. I suddenly realized, I am actually walking closer to the main road when I pushed myself inside, if in case any such incidence happens. I am fear-stricken today and so do many women in the capital or in other cities are. Can you dare to experience the fear? Ah men! (more…)

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