मैं पत्रकार हूँ

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Source- NDTV
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मैं पत्रकार हूँ
हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

ख़बरों की खबर लिए
निर्भीक और निडर बने
मैं तेरा स्तम्भकार हूँ।
हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

कलम है मेरे हाथ में
है सत्य मेरी बात में
ना मोल से, ना लोभ से
ना ताकतों के रौब से
झुका नहीं, टिका रहा
मैं ऐसा वज्रहार हूँ।

हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

तू चाहे मुझको तोड़ दे
चाहे तू मेरी जान ले
जलना पड़े अंगार में
या गोली की बौछार में
मैं सच की राह पर चलूँ
ना डरूँ, ना विश्राम लूँ
जो शब्द- शस्त्र से लड़ूँ
मैं ऐसा व्यंग्यकार हूँ।

हाँ, मैं पत्रकार हूँ।

मैं जा रहा हूँ, मेरे पीछे
देश सारा रो रहा
ये मत समझना, ये मेरा
विद्रोह शांत हो रहा
ये कलम उठती रहे,
क्रांति का अंगार ले,
हर झूठ के विरोध में
सतत खड़ा तैयार हूँ।

मैं पत्रकार हूँ।
हाँ, मैं पत्रकार हूँ। ©

सत्य

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रौबदार, सीधा- सपाट
पूर्ववत
काला- स्याह
किन्तु स्पष्ट

कभी कड़वा- कसैला
दिल दुखाता,
हर्षाता, कभी उल्लास
शक्तिदाता

कभी सूखे दरख़्त- सा
नंगा- निर्वस्त्र
कभी मरियल, किन्तु अटल
निर्भय, निडर

कभी ऐसा भी होता
ना रहकर भी रहता
कभी रहकर भी विलुप्त
कभी चुप, कभी गुप्त।

कभी पीछे धकेलता
कभी आगे ले चलता
डूबते तैरते,
कभी पार ले जाता।

कभी छाँव, कभी धूप
सत्य के हैं कई रूप।

खोलो परतें
करो आलिंगन
सत्य तुम भी, हम भी
और यह जीवन। ©

इलेक्शन जंगल का

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भेड़िए की चीख़ थी या लोमड़ी की पुकार,
सिंह का गरजना था या हाथी का चिंघाड़,
वो जंगल ही था, जहाँ मानव के कुछ मुखौटे
एक दूजे से लड़ते-भिड़ते रहे,
अपना नारा लगाते रहे, रोज़ जिरह करते रहे।
सबकी अपनी अपनी तूती थी, अपने अपने ताने थे
संस्कारों से परे हटकर सबके गजब फ़साने थे।
मगर लोमड़ी का रोना, न भेड़िया समझ पाया
हाथी का चिंघाड़ना, न शेर बूझ पाया।
सब लड़-भिड़ नास कर दिए
अब केवल बचा है जंगल और कुछ बचे-खुचे जीव,
अब देखो किसकी होती है जीत,
कौन जीतेगा यह जंगल, कौन रखेगा शासन की नींव?
हम वहीं खड़े हैं ऊँगली में कालिख़ लगाए
इंतज़ार किये जाते हैं…
कभी तो अपनी किस्मत पर लगी कालिख़ भी मिट जाए… ©

हम, ‘आप’की जनता

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भारत की दिखती तीन साख,
झाड़ू हो कमल हो या हो हाथ।
दुर्घटना तो होनी ही है,
चाहे जितनी हो चुपड़ी बात।

वह रोज़ लुभाकर जायेंगें,
वादों का कार्ड थमाएंगे,
जब तू अपनी मोहर देगा
तुझको ठेंगा वो दिखाएंगें।

तू रोज़ करे अब इंतज़ार,
उनकी कुर्सी है गद्देदार,
वह टस से मस ना होवेंगे
तुझको यूँ ही अब पीसेंगे।

जो लड़ते थे कभी आपस में
मिलकर सरकार बनाएँगे।
जिनका तख्ता यूँ पलट दिया,
उनको (कांग्रेस को) “मिलकर” वो जिताएँगे।

हम मुगलों को क्या कोसेगें
क्या यूनानी, अंग्रेज़ों को।
भारत को लूट लिया सबने
कह कर ‘भई! हमको वोट दो’

“यह नोट लो, हमें वोट दो
अब चाय भी लो
पर वोट दो
भई वोट दो, भई वोट दो
कुछ भी कर लो, बस वोट दो”

तू हाथ रखेगा एक बटन,
वह पांच साल चलाएँगे।
तू एक मिनट में दे सत्ता,
वह एक पल में सब खायेंगें।

चाहे करवा लो लाख जतन
मोर्चा, रैली या गठबंधन।
तू रोएगा सर पीट-पीट
वह हाथ लिए रम करें जशन
वह हाथ लिए रम करें जशन…. ©
– (भारतीय राजनीति से कुंठित)

दो गज़ ज़मीन

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यह लड़ाई थी दो गज़ ज़मीन के लिए
रोज़ लोग मरते थे, रोज़ लोग लड़ते थे,
कफ़न में लिपटी लाशें, पड़ी रहतीं
और “वो”
रोज़ एक बहस में उलझे रहते,
एक नामियादी बहस में-
महज, दो गज़ ज़मीन के लिए।
एक श्मशान था, या शायद-
एक कब्रिस्तान था।
जी हाँ, बहस यही थी। 
आज तक फैसला हो न पाया
कि उस ज़मीं पर-
लाशें जलाई जाएँ या दफनाई
कफ़न में लिपटी लाशें आज भी पड़ी हैं 
उनकी” बात, आज भी, इसी जिद पर अड़ी है
कि “हम जलाएंगे”,
अरे नहीं भई ! हम दफनायेंगे”
ज़रा देखो उन लाशों को
जो चाहे दफनाई जाएँ या जलाई,
उन्हें मिलना है अब इसी मिटटी में,
जाना है वहीँ,
जहाँ
न नाम है, ना ज़मीन की कोई ईकाई
फिर भी बेबस पड़ी हैं,
इसी फैसले के इंतज़ार में-
कहाँ नसीब होगी उन्हें,
दो गज़ ज़मीन। ©
           – ( मुजफ्फरनगर दंगे से व्यथित)